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बस्तर की खनिज संपदा से देश समृद्ध, फिर भी आदिवासी विकास से वंचित क्यों 70-80 वर्षों से बैलाडीला की पहाड़ियों से निकल रहा लौह अयस्क, आखिर कब बदलेगी आदिवासी अंचल की तस्वीर?

📅 25 Oct 2026, 12:34 PM ✍️ Admin 👁 6,663 Views ⏱️ 2 मिनट पठन
बस्तर की खनिज संपदा से देश समृद्ध, फिर भी आदिवासी विकास से वंचित क्यों 70-80 वर्षों से बैलाडीला की पहाड़ियों से निकल रहा लौह अयस्क, आखिर कब बदलेगी आदिवासी अंचल की तस्वीर?

बस्तर केसरी न्यूज़ : संतोष यादव

दंतेवाड़ा/बचेली। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा जिले में स्थित एनएमडीसी (राष्ट्रीय खनिज विकास निगम) की बैलाडीला पहाड़ियों का यह नजारा कई सवाल खड़े करता है। जिन पहाड़ियों को आज हम प्राकृतिक सौंदर्य और आदिवासी संस्कृति की पहचान के रूप में देखते हैं, उन्हीं पहाड़ियों के भीतर मौजूद लौह अयस्क के खनन से आने वाले वर्षों में यहां का प्राकृतिक स्वरूप बदल सकता है। खनिज संपदा के दोहन से देश को आर्थिक लाभ और औद्योगिक विकास मिल रहा है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस खनिज संपदा की वास्तविक कीमत चुका रहे बस्तर के आदिवासी समुदायों को विकास का कितना लाभ मिला है?

पिछले 70-80 वर्षों से बस्तर क्षेत्र की पहाड़ियों से बड़े पैमाने पर लौह अयस्क का उत्खनन किया जा रहा है। एनएमडीसी, सीएमडीसी और अन्य खनन कंपनियों के माध्यम से यहां से निकला लौह अयस्क देश के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिला और देश के विभिन्न हिस्सों में उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध हुआ। लेकिन बस्तर के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है।

हजारों करोड़ का कारोबार, फिर भी गांवों में बुनियादी सुविधाओं का सवाल

इंटरनेट पर उपलब्ध बताए जा रहे वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, एनएमडीसी ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में लगभग 53.16 मिलियन टन लौह अयस्क उत्पादन और 31,554 करोड़ रुपये के सालाना टर्नओवर का आंकड़ा दर्ज किया है। इन आंकड़ों की आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि आवश्यक है। हालांकि, खनन से होने वाले बड़े आर्थिक लाभ के बीच स्थानीय समुदायों के विकास और उनके जीवन स्तर में सुधार का सवाल लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है।

यदि बस्तर की खनिज संपदा देश के विकास में इतना बड़ा योगदान दे रही है, तो फिर इस क्षेत्र के अनेक आदिवासी परिवार आज भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार के अवसरों के लिए संघर्ष क्यों कर रहे हैं? गांवों तक पक्की सड़कें, पर्याप्त पेयजल, बेहतर स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाने में अब तक अपेक्षित सफलता क्यों नहीं मिल पाई है?

ये सवाल केवल सरकार से ही नहीं, बल्कि खनन कंपनियों और संबंधित प्रशासनिक तंत्र से भी जवाब मांगते हैं।

खनन प्रभावित गांवों में शिक्षा और स्वास्थ्य को मिले प्राथमिकता

बस्तर के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित करना विकास की पहली शर्त है। यदि खनन से प्राप्त राजस्व और निर्धारित सामाजिक विकास निधियों का प्रभावी उपयोग किया जाए, तो दूरस्थ गांवों में गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा के अवसर, प्रशिक्षित शिक्षक और डिजिटल शिक्षा जैसी सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं।

इसी तरह, गांवों में स्वास्थ्य केंद्र, पर्याप्त चिकित्सा कर्मचारी, दवाइयां, एंबुलेंस और मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। सड़कों, पेयजल, बिजली और रोजगार के अवसरों को मजबूत करके स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में वास्तविक बदलाव लाया जा सकता है।

खनन से प्रभावित गांवों के विकास के लिए कंपनी के कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR), जिला खनिज न्यास (DMF) और अन्य निर्धारित विकास मदों की राशि का पारदर्शी एवं प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इन निधियों से हुए कार्यों और लाभान्वित परिवारों का विवरण सार्वजनिक होने से जवाबदेही भी तय हो सकेगी।

अब नक्सलवाद का बहाना नहीं, विकास का हिसाब चाहिए

लंबे समय तक बस्तर के कई इलाकों में नक्सलवाद को विकास कार्यों में बाधा के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के कारण कई क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच और निर्माण कार्य प्रभावित हुए, यह वास्तविकता रही है। लेकिन अब जहां सुरक्षा की स्थिति में सुधार हुआ है, वहां विकास कार्यों को गति देने की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिन गांवों तक वर्षों तक विकास की सुविधाएं नहीं पहुंच पाईं, वहां अब शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और रोजगार की योजनाओं का क्रियान्वयन किस गति से हो रहा है? सरकार और संबंधित कंपनियों को खनन प्रभावित गांवों की स्थिति पर स्पष्ट आंकड़ों के साथ जवाब देना चाहिए।

बस्तर की पहाड़ियों के साथ आदिवासियों के भविष्य की भी चिंता जरूरी

बैलाडीला की पहाड़ियां केवल लौह अयस्क का भंडार नहीं हैं। ये क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की आजीविका तथा सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ी हैं। इसलिए खनन के दौरान पर्यावरण संरक्षण, वन अधिकार, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और लागू कानूनी प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है।

विकास का अर्थ केवल पहाड़ों से खनिज निकालना, उत्पादन बढ़ाना या कारोबार के नए रिकॉर्ड बनाना नहीं हो सकता। वास्तविक विकास तब माना जाएगा, जब खनन प्रभावित गांवों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, बीमार लोगों को समय पर इलाज उपलब्ध हो, युवाओं को रोजगार मिले और प्रत्येक परिवार तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचें।

बस्तर की खनिज संपदा से देश का विकास हो रहा है, लेकिन अब यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि उस विकास में बस्तर के आदिवासियों की बराबर की भागीदारी हो। सवाल साफ है—जब बस्तर देश के विकास में इतना बड़ा योगदान दे रहा है, तो बस्तर के विकास का ठोस हिसाब कब सामने आएगा?

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