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नंदराज पहाड़ पर खनन की आहट! क्या आदिवासियों के आराध्य देव की धरती सुरक्षित है?दंतेवाड़ा में डिपॉजिट-13 की ओर बढ़ती खुदाई और सड़क निर्माण को लेकर उठे सवाल, आदिवासी जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर भी निशाना नंदराज पहाड़ को बचाने की लड़ाई वर्षों पुरानी, आदिवासी

📅 25 Oct 2026, 03:36 PM ✍️ Admin 👁 6,420 Views ⏱️ 2 मिनट पठन
नंदराज पहाड़ पर खनन की आहट! क्या आदिवासियों के आराध्य देव की धरती सुरक्षित है?दंतेवाड़ा में डिपॉजिट-13 की ओर बढ़ती खुदाई और सड़क निर्माण को लेकर उठे सवाल, आदिवासी जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर भी निशाना नंदराज पहाड़ को बचाने की लड़ाई वर्षों पुरानी, आदिवासी

बस्तर केसरी न्यूज़ : संतोष यादव

दंतेवाड़ा। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा जिले में स्थित नंदराज पहाड़ को लेकर आदिवासी समाज की धार्मिक आस्था और प्राकृतिक विरासत की सुरक्षा का सवाल एक बार फिर चर्चा में है। पहाड़ की खुदाई और डिपॉजिट-13 की ओर पहुंच मार्ग बनाए जाने की गतिविधियों को देखकर स्थानीय स्तर पर यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले समय में यहां खनन गतिविधियों का विस्तार हो सकता है। आदिवासी समाज के लिए आस्था का केंद्र माने जाने वाले नंदराज पहाड़ को लेकर लोगों के मन में चिंता बढ़ रही है।

बताया जा रहा है कि एनएमडीसी (NMDC) और सीएमडीसी (CMDC) से जुड़ी खनन परियोजना के तहत डिपॉजिट-13 की ओर पहुंच मार्ग का निर्माण किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या विकास और खनन की योजनाओं के बीच आदिवासी समाज की धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण को पर्याप्त प्राथमिकता दी जा रही है?

आदिवासी समाज की आस्था बनाम खनन गतिविधियां

नंदराज पहाड़ केवल जमीन और खनिज संपदा का हिस्सा नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज के एक वर्ग के लिए यह आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है। ऐसे में पहाड़ पर होने वाली किसी भी गतिविधि को केवल खनन या विकास के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा। स्थानीय समुदाय की भावनाओं और परंपराओं को समझना भी जरूरी है।

पहाड़ की ओर बढ़ती गतिविधियों को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या परियोजना से प्रभावित होने वाले आदिवासी समुदायों की चिंताओं और सहमति को उचित महत्व दिया जा रहा है? यदि नंदराज पहाड़ की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को नजरअंदाज किया गया, तो इससे स्थानीय समाज में असंतोष गहरा सकता है।

आदिवासी जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल

इस पूरे मामले में आदिवासी जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। लोगों की अपेक्षा है कि उनके प्रतिनिधि नंदराज पहाड़ की सुरक्षा, आदिवासी अधिकारों और पारंपरिक आस्था से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट रुख सामने रखें।

आखिर जनप्रतिनिधि इस विषय पर क्या कर रहे हैं? क्या उन्होंने प्रभावित समुदायों की चिंताओं को शासन-प्रशासन और संबंधित कंपनियों के सामने प्रभावी ढंग से रखा है? इन सवालों का जवाब सामने आना चाहिए।

हालांकि, जनप्रतिनिधियों की चुप्पी के पीछे किसी प्रकार के निजी लाभ या समझौते का आरोप लगाने के लिए ठोस प्रमाण आवश्यक हैं। इसलिए संबंधित जनप्रतिनिधियों और परियोजना प्रबंधन का पक्ष भी सामने आना जरूरी है।

क्या आदिवासियों को अपने आराध्य पहाड़ की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ेगा?

बस्तर के आदिवासी समाज का जल, जंगल, जमीन और देवस्थलों से गहरा संबंध रहा है। ऐसे में नंदराज पहाड़ को लेकर उठ रही चिंताएं केवल खनन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह सवाल भी है कि विकास की प्रक्रिया में आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता कितनी सुरक्षित है।

यदि स्थानीय समुदाय को अपनी आस्था और पारंपरिक विरासत की रक्षा के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है, तो यह शासन-प्रशासन और संबंधित कंपनियों के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए।

आदिवासी समाज चाहता है कि उसकी बात सुनी जाए, उसकी परंपराओं का सम्मान हो और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों में प्रभावित लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

सरकार और कंपनियों से जवाब की अपेक्षा

नंदराज पहाड़ को लेकर उठ रहे सवालों पर राज्य सरकार, केंद्र सरकार, जिला प्रशासन तथा संबंधित कंपनियों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। डिपॉजिट-13 के लिए बनाए जा रहे मार्ग का उद्देश्य क्या है? परियोजना की वर्तमान स्थिति क्या है? पर्यावरणीय और कानूनी अनुमतियां क्या हैं? प्रभावित आदिवासी समुदायों की सहमति और धार्मिक भावनाओं के संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?

इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने आने चाहिए, ताकि क्षेत्र में फैल रही आशंकाओं का समाधान हो सके।

नंदराज पहाड़ की सुरक्षा का सवाल केवल खनन का मुद्दा नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आस्था, संस्कृति, अधिकारों और भविष्य से भी जुड़ा है। अब देखना होगा कि जिम्मेदार जनप्रतिनिधि, शासन-प्रशासन और संबंधित कंपनियां इस विषय पर क्या कदम उठाते हैं। एक ओर पहाड़ में खनन की तैयारी, दूसरी ओर जल-जंगल-जमीन बचाने की मुहिम

अलनार-गुमियापाल पहाड़ को लेकर स्थानीय युवाओं और आदिवासी समुदाय के बीच अलग-अलग रुख सामने आने की चर्चा दंतेवाड़ा के अलनार-गुमियापाल पहाड़ को लेकर क्षेत्र में खनन और पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा चर्चा में है। एक ओर स्थानीय युवाओं के आरती स्पंज कंपनियों के साथ खड़े होने की बात सामने आ रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय आदिवासी समुदाय जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए विभिन्न स्थानों पर आंदोलन कर रहा है।

पहाड़ में खनन को लेकर क्षेत्र में अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं। जहां कुछ लोग खनन से विकास और रोजगार की संभावनाएं देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समुदाय अपनी पारंपरिक भूमि, प्राकृतिक संसाधनों और सांस्कृतिक पहचान को लेकर चिंतित है।

ऐसे में सवाल उठता है कि खनन से होने वाले विकास और रोजगार के लाभों के साथ-साथ स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण तथा जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा को किस तरह सुनिश्चित किया जाएगा?

बस्तर के भविष्य से जुड़ा यह मुद्दा अब केवल खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि विकास, आदिवासी अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की चुनौती भी है।

नंदराज पहाड़ को बचाने की लड़ाई वर्षों पुरानी, आदिवासी समाजसेविका सोनी सोरी सहित कई लोग उठाते रहे हैं आवाज
जिले में स्थित नंदराज पहाड़, अलनार और गुमियापाल क्षेत्र में जल, जंगल और जमीन की रक्षा का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। आदिवासी समाजसेविका सोनी सोरी सहित कई स्थानीय लोग वर्षों से इन पहाड़ों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की मांग उठाते रहे हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी के कार्यकाल से जुड़े वर्ष 2018 के संदर्भ में भी नंदराज पहाड़ को बचाने का मुद्दा सामने आता रहा है। स्थानीय आदिवासी समुदाय के लिए ये पहाड़ केवल खनिज संपदा के स्रोत नहीं, बल्कि उनकी आस्था, संस्कृति, परंपरा और आजीविका से भी जुड़े हुए हैं।

एक ओर क्षेत्र में खनिज संसाधनों के दोहन और विकास परियोजनाओं को लेकर गतिविधियां जारी हैं, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समुदाय के कई लोग अपनी पारंपरिक भूमि, जंगल और पहाड़ों को सुरक्षित रखने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि विकास की योजनाओं के बीच स्थानीय आदिवासी समाज की भावनाओं, अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण को कितनी प्राथमिकता दी जा रही है?

जल, जंगल और जमीन की यह लड़ाई केवल पहाड़ बचाने का सवाल नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, परंपरा और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी जुड़ी हुई है।

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