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पांच साल से पुनर्वास का इंतजार, अब प्रशासन ने कहा- आने वालों का स्वागत

📅 29 Aug 2026, 03:52 AM ✍️ Admin 👁 7,745 Views ⏱️ 2 मिनट पठन
पांच साल से पुनर्वास का इंतजार, अब प्रशासन ने कहा- आने वालों का स्वागत

संवाददाता =नरेंद्र चौधरी

काठमांडू कैंप में 48 परिवारों की बदहाल जिंदगी, पांच साल से खाली पड़े पुनर्वास के मकान

बचेली। बचेली के वार्ड क्रमांक 18 स्थित काठमांडू कैंप में 48 परिवार आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में पहाड़ पर टीन-टप्पर के घरों में रहने को मजबूर हैं। बस्ती तक पहुंचने के लिए घुमावदार और खतरनाक पहाड़ी सड़क से होकर गुजरना पड़ता है। मौके पर पहुंचने के दौरान घना कोहरा छाया हुआ था, जिससे कुछ दूरी तक रास्ता भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

काठमांडू कैंप में रहने वाले परिवारों के मकान टीन-टप्पर से बने हुए हैं। यहां लोगों के आने-जाने के लिए बनाया गया बस स्टॉप भी टीन-टप्पर का है। बस्ती के भीतर पक्की सड़क नहीं है। कच्चे, पथरीले और पहाड़ी रास्ते से होकर लोगों को अपने घरों तक पहुंचना पड़ता है। बारिश के मौसम में यह रास्ता और भी मुश्किल हो जाता है।

मौसम की मार, सुविधाओं का अभाव

पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण काठमांडू कैंप में बारिश और ठंड का असर अधिक रहता है। इसके बावजूद यहां अस्पताल, दुकान और रोजमर्रा की जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ग्रामीणों के मुताबिक छोटी से छोटी जरूरत के सामान के लिए भी उन्हें करीब 25 किलोमीटर दूर बचेली जाना पड़ता है।

ग्रामीणों का कहना है कि माचिस जैसी छोटी जरूरत की चीज खरीदने के लिए भी उन्हें खतरनाक पहाड़ी रास्ते से होकर नीचे जाना पड़ता है।

नाले के किनारे से पाइप डालकर पानी जुटा रहे ग्रामीण

पेयजल की समस्या भी गंभीर है। ग्रामीणों के अनुसार वे नाले के किनारे लोहे के पाइप डालकर जमीन के नीचे से आने वाले पानी को अपने घरों तक पहुंचाते हैं और इसी पानी का इस्तेमाल करते हैं। पानी लेने के लिए भी ग्रामीणों को कच्चे और पथरीले रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि एनएमडीसी की पानी की पाइपलाइन होने के बावजूद बारिश के दिनों में उसमें लाल रंग का पानी आता है। ग्रामीणों के मुताबिक यह पानी एनएमडीसी के डैम से आता है और बरसात के दौरान इसकी स्थिति खराब हो जाती है।

2011 में विस्थापन का फैसला, 2021 में तैयार हुए मकान

ग्रामीणों के मुताबिक एनएमडीसी क्षेत्र में ब्लास्टिंग के चलते वर्ष 2011 में इन परिवारों के विस्थापन का फैसला किया गया था। यह मामला वर्ष 2011 में विधानसभा में भी चर्चा का विषय बना था।

इसके बाद वर्ष 2018-19 में करीब 349.23 लाख रुपये की लागत से पुराने मार्केट में लगभग 2.5 एकड़ जमीन पर 48 परिवारों के लिए 50 आवास बनाए गए। वर्ष 2021 में ये आवास बनकर तैयार हो गए, लेकिन वर्ष 2026 तक करीब पांच साल बीत जाने के बावजूद प्रभावित परिवारों को वहां शिफ्ट नहीं किया गया।

खाली पड़े आवास, बारिश में क्षतिग्रस्त हुई बाउंड्री

मौके पर देखा गया कि पुनर्वास के लिए बनाए गए आवास खाली पड़े हैं। आवास परिसर की बाहरी बाउंड्री वॉल का कुछ हिस्सा इस साल हुई बारिश में क्षतिग्रस्त होकर गिर गया है। वहीं पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर भी ग्रामीणों की शिकायत है।

एक तरफ 48 परिवारों के लिए 50 मकान बनकर तैयार हैं, दूसरी तरफ वही परिवार आज भी पहाड़ पर टीन-टप्पर के घरों में रहने को मजबूर हैं।

अधिकारी बोले- पहले जानकारी थी कि ग्रामीण नीचे नहीं आना चाहते थे

इस मामले में संबंधित अधिकारियों का कहना है कि उन्हें अब तक यह जानकारी थी कि काठमांडू कैंप के निवासी पहाड़ से नीचे बनाए गए क्वार्टरों में आकर रहने के इच्छुक नहीं हैं। हालांकि अब यदि ग्रामीण स्वयं नीचे आकर पुनर्वासित होना चाहते हैं तो उनका स्वागत है।

अधिकारियों के मुताबिक आवासों में जो भी कमियां शेष हैं, उन्हें जल्द से जल्द दूर करने की व्यवस्था की जाएगी। साथ ही आवासों से जुड़ी कुछ तकनीकी और स्थान संबंधी समस्याएं भी सामने आ रही हैं, जिनका समाधान किया जाना जरूरी है।

रिजर्व फॉरेस्ट और डैम क्षेत्र भी बना तकनीकी अड़चन

अधिकारियों के अनुसार जिस स्थान पर पुनर्वास के लिए आवास बनाए गए हैं, वह क्षेत्र रिजर्व फॉरेस्ट की सीमा में आता है और डैम के नीचे स्थित है। ऐसे में आवासों को लेकर तकनीकी और सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर भी विचार करना पड़ रहा है।

अधिकारियों के मुताबिक हाल ही में इसी डैम के आसपास के क्षेत्र से करीब 11 परिवारों को भी हटाया गया है। एनएमडीसी के मुंबई से आए वैज्ञानिकों द्वारा डैम के आसपास के क्षेत्र को सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील/खतरनाक जोन बताए जाने के बाद वहां रह रहे परिवारों को हटाने की कार्रवाई की गई।

ट्रक पार्किंग की जमीन भी बनी चुनौती

पुनर्वास स्थल के आसपास एक अन्य चुनौती बैलाडीला ट्रक ओनर एसोसिएशन के लिए आवंटित भूमि की भी बताई जा रही है। इस जमीन का इस्तेमाल ट्रकों की पार्किंग के लिए किया जाता है। अधिकारियों के अनुसार पुनर्वास के लिए इस क्षेत्र के इस्तेमाल को लेकर ट्रक ओनर एसोसिएशन की ओर से भी आपत्ति/विरोध सामने आया है।

ऐसे में 48 परिवारों को नीचे बसाने के लिए केवल मकानों में सुविधाएं उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जमीन, वन क्षेत्र, डैम की सुरक्षा और ट्रक पार्किंग से जुड़े तकनीकी व प्रशासनिक पहलुओं का समाधान भी जरूरी है।

अब सवाल- पांच साल से खाली मकानों में कब बसेंगे परिवार?

एक ओर काठमांडू कैंप के परिवार पहाड़ पर टीन-टप्पर के घरों में कठिन परिस्थितियों में रहने की बात कह रहे हैं और अब नीचे आकर बसने की इच्छा जता रहे हैं। दूसरी ओर पांच साल पहले तैयार किए गए पुनर्वास आवास आज भी खाली पड़े हैं।

अधिकारियों का कहना है कि अब ग्रामीण नीचे आना चाहते हैं तो उनकी मांग का स्वागत किया जाएगा और बची हुई कमियों को दूर करने की कोशिश की जाएगी। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि तकनीकी और प्रशासनिक अड़चनों का समाधान कब तक होगा और पांच साल से इंतजार कर रहे 48 परिवार आखिर कब इन आवासों में बस पाएंगे?

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